राजनीति विचार

आज का नारा मै दलित हूँ  मै दलित हूँ

आज का नारा मै दलित हूँ  मै दलित हूँ  , जी हां आज के राजनीति मे दलित होना अधिक फायदेमंद है क्योंकि सारे पार्टी चाहे वो सत्ताधारी हो या फिर विपक्ष बस यही चिल्ला रही है कि हमारे पास दलित है, तो हमारे पास दलित है और चिल्लायें भी क्यों ना इनके हिसाब से दलित होने का अर्थ है वोट होना यानी कि अब की राजनीति दलितों के नाम पर ही हो रही है । युं तो हर बार होती है लेकिन इस बार का थोड़ा अधिक दलितमय सा प्रतित हो रहा है ऐसा लग रहा है कि सम्पुर्ण देश इसी गंगा मे डुबकि लगा कर दलितिये  हो गया है ।

आप सोंच रहे होंगे ये क्या दलित दलित लगा रखा है तो मैं आप को बता दूं कि ये जो नारा है वो मैं नही हमारे देश के राजनीतिक दलों द्वारा लगाया जा रहा है तभी तो सारी पार्टीयां चिल्ला रही है मैं दलित हुं ।

और इसका उदाहरण है जैसे ही बीजेपी ने अपना राष्ट्रपत्ति का कैंडिडेट एक दलित नेता रामनाथ कोविंद को घोषित किया उसके तुरंत बाद कांग्रस ने भी अपना राष्ट्रपत्ति उमीदवार एक दलित महिला नेता मिरा कुमार को ही घोषित किया । अब इससे तो यही पता चलता है कि सारे राजनीतिक दल दलित का ही जाप कर रही है और खास बात यह है कि दोनो ही नेता का सम्बंध बिहार से ही है । रामनाथ कोविंद जो कि बिहार के तत्कालिन राज्यपाल हैं तो दूसरी महिला नेता मिरा कुमार की जन्म भूमि ही बिहार है तो कह सकते है कि राष्ट्रपत्ति का  चुनाव दलित v/s हो चुका है ।

मिरा कुमार का राजनैतिक योगदान

मिरा कुमार का जन्म पटना मे 1945 मे हुआ था इनके पिता जगजिवन राम उप प्रधानमंत्री थे । इनकी शिक्षा दिल्ली के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज और मीरांडा हाउस मे समपन्न हुआ जहां से इन्होंने कानून मे स्नातक और अंग्रेजी साहित्य मे स्नातकोत्तर कीं और उसके बाद 1973 मे मिरा कुमार भारतीय विदेश सेवा के लिए चुनी गईं ।

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मिरा कुमार ने अपना राजैतिक जीवन उत्तर प्रदेश से शुरु की और 1985 मे बिजनौर लोकसभा  क्षेत्र मे हुए उपचुनाव मे उन्होंने वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती और कद्दावर  नेता रामविलास पासवान को पराजित कर पहली बार संसद मे कदम रखीं । उसके बाद उन्होंने अपना क्षेत्र बदला और दिल्ली के कड़ोल बाग से 11वीं तथा 12वीं लोकसभा का चुनाव जीत कर फिर संसद पहुंचीं

फिर वो बिहार के सासाराम से 1998 और 1999 पराजित होने के बाद 2004 मे 258262 वोटों से मुनीलाल को हरा कर इतिहास रच दीं और 15वीं लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें कैबिनेट मे जल संसाधन सौंपा गया । वो कांग्रस के महासचिव और कांग्रस कार्यसमिति के सदस्य भी रहीं और अब इन्हें राष्ट्रपत्ति का उम्मीदवार घोषित किया गया है लेकिन विपक्षीयों का कहना है कि कांग्रस ने उन्हें दलित वोट बैंक को अपने पाले मे डालने के लिए राष्ट्रपत्ति का उमीदवार घोषित किया है  ।

अगर बात सम्पूर्ण देश की करें तो 2011 के मतगणना के अनुसार 20.14 करोड़ की दलित अबादी है तो फिर ये नेता भला दलित  का नाम बार-बार क्यों ना दोहराये क्योंकि यही हैं जो इन नेताओं का बेड़ा बरे आराम से पार लगा सकते है । एक कहावत है  लोहा लोहे को कटता है और शायद इस चुनाव मे ऐसा ही देखने को मिलेगा और दो  दलित आमने-सामने होंगे ।

दलितमय राजनीति

मैं सोंचता हुं क्या हमारे राजनीतिक दल सिर्फ दलितों की राजनीति करती है या फिर समय समय पर गिरगीट की तरह रंग बदल कर कभी दलित तो समान्य वर्ग की माला जपने लगती है और कहती है कि जब तक देश मे जातीवाद रहेगा तब तक देश का विकास नही हो पायेगा । ये जातीवाद को बढावा देता कौन है ? जिन्हें इसे खत्म करने के लिए सबसे आगे आना चाहिए वही इसे बढ़ावा दे कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने मे लगे हुए हैं । मेरे हिसाब से दलित वो लोग नही जिन्हे दलित कहा जाता है बल्कि  वो है जिनकी सोंच ऐसी है दलित जैसा सम्मान उन्हें नही हमारे देश के दो टकिये नेताओं को मिलना चाहिए  जो दलित का रट लगायें हैं ।।

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://nationfirst.co

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