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इस आग में और कब तक झुलसेगा भारत ???

भारत यानी की एक ऐसा देश जहां की राजनीति जातीवाद और आरक्षण से शुरू होती है और उसी के गलीयारे मे दम भी तोड़ देती है । पार्टी कोई भी हो उसका चुनावी मुद्दा मात्र जातीवाद और आरक्षण से ही शुरू होती है और तमाम चुनावी वादे भी कहीं न कहीं इसी के परिधी मे घुमती रहती है क्योंकि कही न कही नेताओं को लगता है भारत मे अगर अपनी जीत दर्ज करानी है तो इसका सबसे बड़ा हथियार जातीवाद और आऱक्षण है और शायद यह सत्य भी है क्योंकि अगर हम भारत मे वोटबैंक की बात करें तो वैसे लोगों की संख्या ज्यादा है जिन्हें आऱक्षण प्राप्त है ।

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क्या है आरक्षण

आरक्षण का अर्थ होता है सुरक्षीत करना, तो यह किस तरह की सुरक्षा है जहां जातीवादी रोटी सेक कर लोगों को सुरक्षा प्रदान किया जा रहा है? एक तरफ तो हमारी सरकार ये कहते फिरती है की इस देश के तमाम नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त है कोई भी समुदाय एक दुसरे से भिन्न नहीं है और कानूनी तौर पर अगर कोई जातीवाद को हवा दे तो उसके लिए दण्ड का भी प्रावधान है और दुसरी तरफ इसी समाज को ओबीसी, एससी, एसटी, बीसी 1, बीसी 2 और जेनरल के नाम पर सरकार ही बांटने का काम करती है तो क्या इनके लिए कोइ दण्ड का प्रावधान नही किया जा सकता शायद नही क्योंकि इन्हें जातीवादी रोटी सेक कर लोगों को खिलाने का जन्म सिध्द अधिकार प्राप्त है और इनके लिए शायद किसी कानूनी प्रक्रिया का प्रावधान भी नही है ।

आरक्षण का इतिहास

अगर भारत मे आरक्षण के इतिहास की बात करें तो आजादी से पहले ही 1882 मे पहली बार हंटर कमीशन का गठन करके इस आग को सुलगाया गया था जिसमे महात्मा ज्योतिराव फुले ने वंचित तबके के लिए मुफ्त एंव अनिवार्य शिक्षा की वकालत करते हुए आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग कि थी उसके बाद 1891 मे श्रावणकोर रियायत मे सिविल नौकरीयो मे बाहरी के जगह भारतीयों को सरकारी नौकरी देने की बात की गई फिर 1901 मे कोल्हापुर मे साहुजी महराज ने वंचित लोगों के लिए 50 प्रतिशत आऱक्षण का व्यवस्था किया उसके बाद 1908 मे अंग्रेजों ने भी प्रशासन ने कम हिस्सेदारी वाली जातीयों की भागीदारी बढ़ाने का प्रावधान किया ।

अगर आजादी के बाद भारत मे आऱक्षण व्यवस्था की बात करें तो अनुशुचित जाती जन जीतीयों के लिए 10 वर्षों के लिए आरक्षण का प्रावधन किया गया था उसके बाद लगातार आरक्षण की समय सीमा को बढ़ाता रहा गया और 1979 मे मोरारजी देसाई की सरकार ने मंडल कमीश्न का गठन किया जिसके अध्यक्ष बिंदेश्वरी प्रसाद मंडले थे और इस आयोग ने 1930 के जनसंख्या के आंकड़ो पर 1257 समुदायो को पिछड़ा घोषित कर इनकी आबादि 52 प्रतिशत कर दिया गया और आयोग ने 1980 मे अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए आरक्षण को 22 प्रतिशत से बढ़ा कर 49.5 प्रतिशत कर दिया गया जिसमे ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत निर्धारित किया गया उसके बात 1990 मे वीपी सिंह की सरकार ने इसे लागू किया

जिसके विरोध मे सुप्रिम कोर्ट मे याचिका दायर की गई और कोर्ट ने भी इस पर मुहर लगाते हुए 50 प्रतिशत आरक्षण निर्धीरित कर दिया और तब से लेकर आज तक देश मे आऱक्षण के नाम पर लगातार लोगों को बांटने का काम जारी है ।

आरक्षण के नियमों में होना चाहिए संसोधन

मैं कहता हुं क्या आरक्षण देने से ही देश का विकास होगा क्या जब तक आरक्षण की रोटी नही सेकी जाएगी तब तक हमारे देश विकास नहीं हो सकता ऐसा बिल्कुल नही है सच तो यह है कि अगर इसी तरह आऱक्षण की आग जलती रही तो हमारा देश कभी भी विकास नही कर सकेगा । मैं ये नहीं कहता की आरक्षण नहीं होना चाहिए, आऱक्षण होना चाहिए लेकिन किसी समुदाय के लिए नही बल्कि आरक्षण वैसे लोगों के लिए  होना चाहिए जो शारिरीक और आर्थिक रुप से कमजोर हों । जब तक इस आरक्षण नियम मे बदलाव नही किया जाएगा तब तक भारतीयों मे एकता होना सम्भव नही है

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://thenationfirst.in

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