कविता | poem

कतरा कतरा खुन का बह जाने दे

कतरा कतरा खुन का बह जाने दे

जितना भी दर्द है हमारे अंदर रह जाने दे 

समंदर भी आतुर है आगोश  मे भरने को

शेष है जिन्दगी अभी हम तैयार हैं हर दर्द सहने को

सफलता की सीढी हम खुद बनाएंगे

अपने जीवन में चन्दमा सा प्रकाश फैलाएंगे

सुर्य की तरह प्रकाश हमारा अपना होगा,

लड़ता रहुं मैं सदा इस दूनिया  से

कभी न कभी पूरा हमारा सपना होगा

लड़ने के दौर मे गीरेंगे लड़खराएंगे

फिक्र नही हमें गिरने के बाद  खुद को

संभालना सीख जाएंगे 

कतरा कतरा खुन का बह जाने दे 

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 रचना: राहुल तिवारी 

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