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कब तक सेकोगे राम- बाबरी पर रोटी ?

योध्या विवाद एक ऐसा विवाद है जो राजनीतिक, ऐतिहासिक और समाजिक- धार्मिक भावनाओं से उभरा है , इस विवाद का जन्म 6 दिसम्वर 1992 को ही हो चुका था । इस विवाद का मुख्य कारण है दो समुदायों की आस्था और जब हमारे देश मे बात आस्था कि होती है तो कोई अपना सर कलम करवाने मे पिछे नहीं हटता बगैर ये सोंचे की इसका अंजाम क्या होगा और वो अपना पूरी ताकत आस्था की रक्षा मे झोंक देते हैं । वहीं हम दोनो समुदायों के मत को देखें तो एक तरफ हिन्दूओं का कहना है कि आयोध्या में जो विवादित भूमि है वो राम का है क्योंकि बाबर के आने के पूर्व यहां राम मंदिर था जिस कारण उस पर हमारा अधिकार है  और दूसरी तरफ मुस्लमानों का कहना है कि यहां बावरी नामक एक मस्जिद थी जिसे तोड़ा गया , उस पर हमारा अधिकार है । अगर इसकी सत्यता पर नजर डालें तो यह फैजाबाद जिले के आयोध्या शहर मे रामकोट पहाड़ी पर एक मस्जिद थी जिसका निर्माण 1527 मे भारत के प्रथम मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर किया गया  जिसका नाम मस्जिद-ए-जन्म-स्थान था लेकिन पुजारियों से हिन्दू ढ़ाचे या निर्माण को छिनने के बाद मिरबाकि द्वारा इसका नाम बदल कर बाबरी मस्जिद रख दिया गया । अगर जिले के नाम से देखा जाय तो यह स्थान मुस्लमानों का प्रतित होता है लेकिन यह जरूरी नही की  वहां मंदिर नहीं हो सकता चुकि यह मस्जिद रामकोट पहाड़ी पर स्थित है और रामकोट का अर्थ  होता है राम का किला और किला अर्थ होता है महल अर्थात एक ऐसा महल जिसमें राम का वास हो तो क्या राम महल मे अल्लाह हो सकते हैं ?

उत्तर प्रदेश मे 3 करोड़ 10 लाख मुस्लिम रहते हैं और बाबरी मस्जिद उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ी मस्जिदों मे से एक  इसके अलावा उत्तर प्रदेश मे और भी मस्जिद है लेकिन विवादों मे केवल बाबरी मस्जिद ही है इसके आकार और प्रसिध्दि के बावजुद भी इसका इस्तेमाल कम किया जाता था क्या कारण हो सकता है कि आम मस्जिदों की तरह इसका इस्तेमाल ना के बराबर किया जाता था और हिन्दूओं द्वारा अदालतों में अनेक याचिका दायर किया गया और इसके परिणाम स्वरुप इस स्थल पर राम के हिन्दू भक्तों का प्रवेश होने लगा और देखते देखते यह एक रणक्षेत्र में तबदील हो गया  और लगभग 1 हजार लोग आस्था  के नाम पर बलि चढ़ गये । 1992 में हुए विध्वंश की जांच के लिए सरकार ने जब लिब्राहन आयोग का गठन किया तो इस आयोग ने 68 लोगों को दोषी ठहराया इनमे ज्यादातर बीजेपी के नेता ही थे जिसमे अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवानी जैसे बड़े हस्ती भी शामिल थे  ।

विवादित स्थल है जिसका निष्कर्ष दो समुदायों के मिलने से ही शायद शम्भव हो सकता है । परंतु इस विवाद पर क्या देश के दो टकिये नेता विराम चिन्ह लगने  देंगे ? और मै ऐसा इस लिए कह रहा हूं क्योंकि कहीं ना कहीं इस स्थान को विवाद के घेरे में लाने का काम भी दो टकिये नेताओं  द्वारा ही किया गया है और किया जाता रहेगा ।

इतिहास के पन्नों को खंगालने के बाद मैं इस निष्कर्स पर पहुंचा की क्या राजनीतिक दल अपना राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए उन आठ सौ बेकसुर लोगों की जान का सौदा कर सकते है और कब तक हिन्दू राम और मुस्लमान अल्लाह के नाम पर आपस मे लड़ते रहेंगे और इन नेताओं को राजनीतिक रोटी सेंकने का मौका देते रहेंगे । क्योंकि कोइ भी व्यक्ति हमलावर तभी होता है जब सामने वाला कमजोर नजर आता है और शायद इसी कमजोरी का फायदा देश के दो टकिये नेताओं द्वारा उठाया जाता रहा है

कोर्ट का भी कहना है कि इस समस्या को आपस मे बैठ कर सुलझा लें तो बेहतर होगा क्योंकि जब तक इस मुद्दे पर शांति वार्तालाप नहीं होगा तब तक इस मुद्दे से निजात नही पाया जा सकता है । मेरा मानना है कि क्यों ना इस स्थान पर स्कूल कॉलेज या होस्पिटल का निर्माण कर दिया जाए क्योंकि अगर इस तरह के सार्वजनिक स्थानों का निर्माण कराया जाता है तो यहां ना ही किसी धर्म का वंधन होगा और नाही किसी दोकटकिय नेता का अंकुश और अगर ऐसा होता है तो  इस विवाद पर सदा के लिए विराम चिन्ह लग जाए और इंसानियत का कत्ल जो इस विवाद में हुआ उस पर अब अंकुश लग जाए ।

 

– राहुल तिवारी 

 

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://thenationfirst.in

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