इतिहास के पन्नों से

जब अटल जी ने कलाम साहब से कहा था ‘पहली बार कुछ मांग रहा हूं मना मत कीजियेगा’

भारतीय राजनीति में बहुत एसे अनकहीं और अनसुने किस्से हैं जो बेहद ही रोचक और मार्मिक है लेकिन उनमें से  कम ही एसे किस्से होते हैं जिसे सुनकर आपका और हमारा उस राजनेता के प्रति आदर और सम्मान बढ़ जाता हो । आज हम भारतीय राजनीति के एसे ही दो युगपुरूष भारत के 10वें प्रधानमंत्री पण्डित अटल बिहारी वाजपेयी  और 11वें राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के बीच हुए वाक्ये की बात करने जा रहें हैं जब अटल जी ने कलाम साहब से कहा था पहली बार आपसे कुछ मांग रहा हूं मना मत कीजियेगा। किसी प्रधानमंत्री का ये विनम्रता देखते ही बनता है..

अटल बिहारी वाजपेयी  और  डॉ एपीजे अब्दुल कलाम आपस में बात करते हुए

दरअसल ये बात तब की है जब बीजेपी 11 वें राष्ट्रपति के चयन की तैयारी में था और बैठकों का दौर लगातार चल रहा था। तमाम बैठकों के बाद 5 नामों पर विचार किया गया। पहला नाम था महाराष्ट्र के गवर्नर पीसी एलेक्सजेंडर, दूसरा नाम था उस वक्त के उपराष्ट्रपति कृष्णकांत, तीसरा नाम था एम एल सिंगवी इसके अलावा जो दो नाम थे वो थे पूर्व रक्षामन्त्री के सी पंत और आखरी जो नाम था वो डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का था।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका नाम सबसे पहले किसने राष्ट्रपति चुनाव के लिए पारित किया था। वो थे कभी रक्षामन्त्री रहे उस वक्त के सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, राष्ट्रपति के लिए एनडीए नेताओं के साथ मीटिंग होने लगी। ऐसी ही एक मीटिंग बीजेपी ने 6 जून 2002 को दिल्ली में किया। जहां मुलायम सिंह ने एपीजे अब्दुल कलाम का नाम पारित किया। लेकिन तब तक एनडीए के ज्यादातर दल बीजेपी के सुझाए हुए पीसी एलेक्सजेंडर के नाम पर सहमत हो चुके थे। इसलिए किसी ने मुलायम सिंह की राय पर उस वक्त कोई ध्यान नहीं दिया।

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6 जून 2002 लालकृष्ण आडवाणी के घर पर एक मीटिंग आयोजित हुई। जहां प्रमोद महाजन ने नायडू को बताया कि एनडीए के ज्यादातर साथी दल एनडीए के सुझाए हुए नाम पीसी एलेक्सजेंडर पर सहमति बना चुके है। और चंद्रबाबू नायडू ने पीसी एलेक्सजेंडर के नाम पर वीटो कर दिए। क्योंकि उनको याद आ रही थी 18 साल पुरानी सियासी दुश्मनी।

जिसका एक अंक खेला गया हैदराबाद और दिल्ली के बीच 1984 में। उस वक्त हैदराबाद में कांग्रेस के राज्यपाल थे रामलाल जिन्होंने एनटी रामाराव की प्रचंड बहुत से 1 साल पहले जीत कर आई सरकार को बर्खास्त कर दिया और रामा राव के बागी भास्कर राव को मुख्यमंत्री की शपथ दिलवा दी। जबकि उनके पास विधायकों का बहुमत भी नहीं था। नायडू को ये लगता था कि उस वक्त की प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पीसी एलेक्सजेंडर का दिमाग इस फैसले के पीछे काम कर रहा था।

और ऐसे में उनका वीटो करना लाजमी था। वीटो के साथ साथ चंद्रबाबू नायडू ने एक नाम काउंटर करने के लिए आगे पढ़ाया वो नाम था कृष्णकांत का। मगर कृष्णकांत के नाम पर कटर भाजपेई सहमत नहीं हो पा रहे थे।उन्हें याद आ रहा था 1978 का मामला। जब समाजवादी धारा दोहरी सदस्यों को लेकर जनसंघ के मंत्रियों पर निशाना साध रहा था। इस धरे का नेतृत्व मधु लिमये कर रहे थे।और उनके एक  प्रमुख समर्थक थे कृष्णकांत। बैठक पूरी होने पर ये तय किया गया कि इन नामों पर साथी दलों के साथ विचार कर लिया जाए। 7 जून 2002 इस बार चयन दल की मीटिंग प्रधानमन्त्री आवास पर हो रही थी।

जॉर्ज फर्नांडिस ने बैठक में सभी को बताया की कोई भी साथी दल कृष्णकांत के नाम पर सहमत नहीं हैं। वहीं शिवसेना ने यहां तक कह दिया है कि अगर इस नाम को लेकर भाजपा ने दबाव बनाया गया तो वो गठबंधन से हट जाएगी। ऐसे में ये तय किया गया कि पीसी एलेक्सजेंडर के नाम को ही एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति चुनाव के लिए पारित किया जाए। चंद्रबाबू नायडू को भी बता दिया गया कि दूसरा कोई चारा नहीं है। जिसके बाद तय हुआ कि उस रात ही ऐलान हो। जिसके बाद नायडू ने कहा मैं इस नाम पर सहमत हूं लेकिन मुझे 1 दिन का समय दीजिए। जिसके बाद 8 जून की सुबह अटल बिहारी वाजपेई को पीसी एलेक्सजेंडर के नाम का ऐलान करना था तब एक आदमी की दिल्ली में ढूंढाई चल रही थी वो आदमी थे चंद्रबाबू नायडू।

लगातार चंद्रबाबू नायडू को फोन किए जा रहे थे लेकिन हैदराबाद में उन्होंने किसी के भी फोन का जवाब नहीं दिया। ऐसे में बीजेपी ने अपने प्लान बी को एक्टिव कर दिया। उसके लिए प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव बृजेश मिश्र कांग्रेस के नेता और सोनिया के करीबी नटवर सिंह से मिले। बातों बातों में बृजेश मिश्र ने नटवर सिंह से कहा कि हम तो पीसी एलेक्जैंडर का नाम चाहते थे। लेकिन चंद्रबाबू के दबाव में कृष्णकांत के नाम पर सहमति बन गई है। नटवर सिंह ने फ़ौरन इसकी सूचना अपने कांग्रेसी आकाओ को दी। उधर कृष्णकांत को भी इसकी भनक लग गई और उन्होंने  चंद्रबाबू नायडू को फोन करके समर्थन के लिए शुक्रिया कह दिया। लेकिन 8 जून 2002 की शाम अभी बिती नहीं थी। एक बार फिर बीजेपी ने बैठक की। उसमे सभी नामों पर फिर से विचार किया गया।तब प्रमोद महाजन ने एक नाम सुझाया वो नाम था डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का। जॉर्ज फर्नांडिस ने फटाफट सभी घातक दलों से इस पर सहमति ली। उसके बाद वो पहुंचे प्रधानमंत्री आवास अटल बिहारी वाजपेई को इस बदलाव के बारे में बताने के लिए पहुंचे। जहां उन्होंने वाजपेई को इस नाम के बारे में बताया।

वाजपेई भी इस नाम पर सहमत हो गए। जिसके बाद चंद्रबाबू नायडू को फोन कर कहा गया कि बीजेपी कृष्णकांत के नाम पर सहमत है लेकिन कोई और दल इस नाम पर सहमत नहीं है। जिसके बाद नायडू को अब्दुल कलाम का नाम बता कहा गया कि आप भी अब इस नाम पर सहमत हो जाइए। जिसके बाद नायडू ने भी हामी भर दी और तय हुआ कि एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति चुनाव के लिए एपीजे अब्दुल कलाम का नाम पारित किया जायेगा। उस वक्त कलाम साहब अपनी सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट  लेकर अपने पसंदीदा काम अन्ना मलाई यूनिवर्सिटी में हमेशा की तरह अपना लेक्चर लिए। उस लेक्चर को ख़त्म कर अगले लेक्चर के नोट देख रहे थे।

तब उनके पास पहुंचे उस विश्वविद्यालय के वीसी डॉ ए कलानिधि। उन्होंने कलाम साहब से कहा कि आपके दफ्तर का फोन पिछले दो घंटे से लगातार बज रहा है। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री आपसे बात करना चाहते हैं। जिसके बाद डॉ कलाम फोन के पास पहुंचे। बताया गया कि प्रधानमंत्री जल्द ही लाइन पर आएंगे। लेकिन तब तक उनका मोबाइल फोन बज उठा इस बार लाइन पर थे आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू। उन्होंने कलाम साहब से बस इतना कहा कि प्रधानमंत्री को आपसे बहुत जरूरी बात करनी है।

आप कृप्या ना मत कहियेगा। डॉ कलाम समझ नही पाए की ऐसी क्या चीज़ है जिसके लिए उनको ना नहीं कहना है। तब तक प्रधानमंत्री की आवाज फोन पर गूंजने लगी थी। प्रधानमंत्री ने डॉ कलाम से पूछा कलाम साहब कैसा चल रहा है आपके पढ़ाई लिखाई का काम। डॉ कलाम ने जवाब दिया बहुत अच्छा।जिसके बाद अटल बिहारी वाजपेई बोले मैं आपसे पहली बार कुछ मांग रहा हु प्लीज़ ना मत कीजिएगा। मैं अभी अभी सभी दलों की बैठक से लौटा हूं। और सभी ने निर्णय लिया है कि देश को 11 वें राष्ट्रपति के रूप में आपकी जरूरत है।

मुझे कल इसका ऐलान करना है प्लीज़ ना मत कीजिएगा। जिसके बाद डॉ कलाम ने अटल बिहारी वाजपेई से कुछ घंटो का समय मांगा। जिसके बाद कलाम ने हामी भर दी। 10 जून को एनडीए की तरफ से एपीजे अब्दुल कलाम के नाम का ऐलान हुआ। सपा तो जैसे इसका इंतेज़ार कर रही थी फौरन समर्थन का ऐलान कर दिया। उधर लेफ्ट पार्टियों ने विरोध किया। उनका कहना था कि कलाम ने मिसाइल बनाई है बम बनाए है और ये हमारे दर्शन के खिलाफ है।ऐसे में  कलाम के खिलाफ वो कैप्टन लक्ष्मी सेहगल को लेकर आए। जो कानपुर में बतौर डॉ गरीबों की सेवा कर रही थी। लक्ष्मी सेहगल आजाद हिन्द फौज का हिस्सा रहीं थी। 18 जुलाई 2002 को जब राष्ट्रपति के लिए नतीजों का ऐलान हुआ तो एनडीए के उम्मीदवार डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को मिले 9 लाख 22 हजार 8 सौ 84 मूल्य के वोट जबकि लक्ष्मी सेहगल को मिले 1 लाख 7 हजार 3 सौ 66 मूल्य के वोट इस तरह से एपीजे अब्दुल कलाम देश के 11 वें राष्ट्रपति बन गए।

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