राजनीति

नीतीश के इस एक गलती से टूट गई 13 साल पुरानी दोस्ती

नीतीश कुमार और शरद यादव की राजनीतिक सूझ बूझ ने आज जदयू को एक नया मुकाम दिया है। नीतीश कुमार को शरद यादव का साथ 30 अक्टूबर 2003 को मिला था जिसके बाद से लगातार नीतीश कुमार कुर्सी कुमार बने रहे लेकिन नीतीश कुमार को कुर्सी कुमार बनाने वाले शरद यादव के ही जदयू से टिकट कटती नज़र आ रही है । पिछले 13 सालों से  शरद यादव ने नीतीश कुमार का हर कदम पर साथ  दिया है लेकिन ये 13 साल पुरानी दोस्ती आज दम तोड़ने के कगार पर है

नीतीश के साथ हमेशा थे शरद यादव

बिहार की राजनीति और सत्ता से लालू प्रसाद यादव को बेदखल करने और नीतीश कुमार को सत्ता पर काबिज करने में शरद यादव ने अहम रोल निभाया था । जब लालू यादव सत्ता में थे तब शरद यादव, नीतीश कुमार और रामबिलास पासवान एक साथ आए और नीतीश की समता पार्टी और पासवान की लोकशक्ति पार्टी शरद यादव की पार्टी जनतादल के साथ मिले जिसके बाद अस्तित्व में आया जनता दल यूनाइटेड जिसमे समता पार्टी से उसका निशान तीर लिया गया और पार्टी का नाम और झंडा शरद यादव के पार्टी से लिया गया ।

लेकिन कुछ ही समय बाद रामबिलास पासवान जनता दल यूनाइटेड से अलग हो गए और एक नई पार्टी एलजेपी का गठन किया और उस समय शरद यादव नीतीश कुमार के साथ खड़े थे। इसके बाद बीजेपी के साथ हाथ मिलाया और 24 अक्टूबर 2005 को राजनीति के धुरंधर लालू प्रसाद यादव को पहली बार जोरदार पटखनी दी।

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सत्ता पर काबिज होने के बाद नीतीश कुमार कुर्सी संभालते रहे और शरद यादव दिल्ली की राजनीति और मीडिया में उन्हें सुसान बाबू बनाते रहे । उसके बाद शरद यादव ने बीजेपी के साथ होने के बावजूद मुस्लिम और यादव समुदाय का एक बड़े तबके को अपना वोट बैंक बनाने का काम भी बखूबी करते रहे।

लेकिन दिसम्बर 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के नाम पर जदयू और बीजेपी में फूट पड़ गई जिसके बाद मुश्किल में पड़ी जदयू को शरद यादव ने एक बार फिर कंधा दिया और कहा कि हमारी पार्टी सेक्युलर है और ऐसे में मोदी को बीजेपी प्रधानमंत्री के लिए प्रोजेक्ट करेगी तो जदयू समर्थन नही देगी । जिसके बाद 2014 लोकसभा चुनाव में NDA ने 40 में से 33 सीटों पर अपना दबदबा बनाया और जदयू के सामने विकट समस्या आ खड़ी हुई तो जदयू के अस्तित्व को बचने के लिए 2015 में जदयू, राजद ओर कोंग्रेस को मिला कर महागठबंधन की नीव रखी गई और बीजेपी को पछाड़ नीतीश कुमार को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन यह महागठबंधन ज़्यादा दिनों तक सांस नही ले पाई और जुलाई 2017 में दम तोड़ दी।

लेकिन जब बात कुर्सी की आई तो एक बार फिर नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर सत्ता के गलियारे में कदम रखा और इस बात की खबर शायद शरद यादव को नही थी लेकिन जब उन्हें पता चला तो उन्होंने 13 साल पुरानी दोस्ती को भुलाकर बगावती सुर अपना लिया और आज दोनों एक दूसरे पर हमलावर हो गए और इस्थिति पार्टी टूटने की आ बनी है । जहां नीतीश कुमार ने 13 साल पुराने मित्र बीजेपी को छोड़ा था वही अब नीतीश कुमार 13 साल पुराने कंधे को भी छोड़ने की तैयारी में हैं ।

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://thenationfirst.in

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