जुर्म

रामानुज हत्याकांड: मारने वाली भीड़ कह रही थी ‘ऑर्डर है आर्डर है मारो’ कहीं ये आर्डर ..!

मुजफ्फरपुर के बहिलवारा में जिस रामानुज शाही की पीट पीटकर नृशंस हत्या कर दी गई,वहां अब सवाल पर सवाल उठाती जा रही है| अगर लोग चाहें तो उसे एक शहीद के रूप में पेश किया जा सकता है,इसे अगड़े बनाम पिछड़े की लड़ाई बनाने वालों की भी कमी नही है| लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो अब वातावरण में घूम रहा है,वह है कि भीड़ को किसनें लाइसेंस दिया कि रामानुज शाही को पीट पीटकर मार डाले |

हम उस देश में रहते हैं जहाँ अजमल कसाब,अफजल गुरू जैसे आतंकवादियों को भी पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत सजा दी गई…लेकिन एक मामूली से अपराधी को लोग पीट पीटकर मार डालते हैं और पुलिस तमाशाबीन बनी रहती है| मैं उसे मामूली अपराधी इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उससे कई गुणा बड़े अपराधी पुलिस के संरक्षण में कानून से बचते चल रहे हैं| वो तो भला हो,घटनास्थल से विडियो बनानें वाले का जिसनें बहिलवारा के उस भीड़ का काला चेहरा सबके सामने लाया और आज हम उस पर चर्चा कर रहे हैं| लगभग दस विडियो वायरल हो रहे हैं जिसमें उसकी बेरहमी से पिटाई का पूरा सबूत मौजूद है|

अब आइये मेन मुद्दे पर…..एक विडियो है जिसमें रामानुज शाही जिंदा है,वह तड़प रहा है,भीड़ से बचनें का उसके पास कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा..चारो तरफ ग्रामीण भीड़ के शक्ल में खड़े हैं जैसे मानों यमराज यमदूतों के साथ साक्षात आ गए हो…..एक लुंगी पहना शख्स लाठी से उसे पीट रहा है, तभी पीछे से एक आवाज आती है जिसमें एक आदमी कह रहा है  ‘मारिए मारिए ऑर्डर है ऑर्डर है मारिए’  | आखिर ये किसका ऑर्डर है,किसने उस भीड़ को ऑर्डर दिया उसे मारनें का……क्या वहाँ प्रशासन का ऑर्डर था उसे मार डालनें का? अगर हाँ तो तत्काल जैंतपुर थानें के थानाध्यक्ष और अन्य पुलिसवालों को सस्पेंड किया जाए और उनपर न्यायिक केस भी चलाया जाए|

यह लाख टका सच है कि अगर वहाँ पुलिस अपना काम करती तो उसे इसतरह मारा नहीं जाता….यह भी हो सकता है कि पुलिस,जो पिछले डेढ़ महीनें से उसे पकड़नें में नाकाम रही थी,अपनी नाकामी छुपानें के लिए भीड़ को उसे पीटकर मार डालनें का आदेश दिया हो…उसी समय उसके एक साथी रंजीत साह को पुलिस पकड़ लेती है तो रामानुज शाही को भीड़ के भरोसे क्यों छोड़ा गया? अगर पुलिस वहाँ मौजूद थी,तो उसे क्यों नहीं बचा पायी? अगर नहीं, तो दूसरे अपराधी को अरेस्ट करके पुलिस वहाँ से भाग क्यों गई? अपने तोंद को न संभाल सकनें वाले पुलिस के भरोसे अगर किसी थानें की सुरक्षा छोड़नी हीं है,तो थानें की जरूरत क्या है?

अगर भीड़ हीं अपनी मनमानी से मृत्युदंड दे देती है तो कोर्ट और कानून का क्या काम? ये सारे सवाल पुलिस प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं|  जहाँ थानें के दारोगा जी के पास अपनी सुरक्षा के लिए कोई हथियार नहीं है वहाँ बाकी अपेक्षा तो बेमानी है| पुलिस नें चार सौ से पाँच सौ अज्ञात लोगों पर एफआईआर किया है जबकि  मारनें वाली भीड़ में से ज्यादातर का चेहरा स्पष्ट दिख रहा है,  यहाँ तक की कुदाल को उल्टा करके चला रहा शख्स और लाठी से पीट रहा शख्स विडियो में स्पष्ट दिख रहा है,फिर पुलिस सोई क्यों है?   अफसोस की बात है कि किसी भी राजनीतिक पार्टी नें इस मुद्दे पर कुछ भी प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा|

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कारण साफ है वोटबैंक की राजनीति में अगर मारनें वालों के खिलाफ वो बोलेंगे तो अगली बार दलित और यादव उन्हें वोट कैसे देंगे| एक छोटा सा सवाल जो बड़ा हो सकता है, अगर मरनें वाला अपराधी कोई दलित या अल्पसंख्यक होता तो अबतक सब खामोश होते? …बिल्कुल भी नहीं,अबतक तो विधवा विलाप शुरू हो गया होता| लेकिन रामानुज शाही एक अपराधी था, यह जवाब गर्व से लोग ऐसे दे रहे हैं मानो सारी घटना वही करता था…बात बात में पिस्टल लहराना उसकी आदत थी लेकिन उसनें अबतक कितनें मर्डर किए? मरने वाले दिन से एक दिन पहले एक कोचिंग संचालक को गोली मारकर हत्या की…लेकिन अनगिनत हत्या करनें वाला शहाबुद्दीन अभी भी जेल में ऐशो आराम की जिंदगी क्यों जी रहा है| उसको भी भीड़ के हाथों मरवा देना चाहिए था न….कहाँ मिला पत्रकार राजदेव रंजन के परिवार को इंसाफ….सिर्फ ढ़कोसलापन दिखानें से कुछ नहीं होनेवाला, बस सही कार्रवाई का इंतजार है|

पुलिस की कार्यवाही को देखकर लगता है कि वो मामले को ठंढ़े बस्ते में डालनें के पूरे प्लान में है, लेकिन ऐसा होगा नहीं…भले हीं मरने वाला अपराधी हो लेकिन उसके परिवार को भी न्याय मिलना चाहिए

विडियो में देखें भीड़ ने कैसे हैवानियत की सारी हदें पार कर दी 

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Ankush Kumar Ashu

Alrounder, A pure Indian, Young Journalist, Sports lover, Sports and political commentator

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