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यमुना नदी नहीं, एक नाला है!

अपना प्यारा देश भारत तो कई मायनों मे दिलचस्प है लेकिन इसकी विविधता मे एकता वाली छवि ज्यादा हीं प्रचलित है। कुछ यहाँ के निवासियों के बदौलत तो प्रकृति भी इस देश पर कुछ ज्यादा हीं मेहरबान है। यमुना नदी भी इन्ही में से एक है जिसे हिंदू पुराणों मे यमराज की बहन बताया गया है।

यमुना शब्द का जिक्र होते हीं मन अपार उमंग से भर जाता है। यमुना नदी की उत्पति उस समय की मानी जाती है जब धरती पर मनुष्यों का नहीं देवी देवताओं और दानवों का वास होता था। यह नदी न जाने इतिहास के कितने पन्नों को अपने अंदर समेट कर बैठी है।

कही यमुना कहीं कालिंदी तो कहीं जमुना के नाम से प्रसिद्ध यह नदी अपने आसपास दैविक काल से लेकर आधुनिक काल तक के सबूतों को जिंदा रखी हुई है। भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा हो या उनका प्रिय स्थान वृंदावन, यमुना के निर्मल जल से हजारों सालों से सुशोभित होती आई है।

विश्व के सात आश्चर्यों मे से एक ताजमहल के बगल से गुजरती यह नदी इसकी खूबसूरती मे चार चाँद लगा देती है। जिस यमुना की तारीफें करतें नहीं थकते,वह यमुना अब निर्मल नहीं रह गई है। उत्तराखंड के टिहरी गडवाल जिले में यमुनोत्री से निकलनेवाली यह नदी प्रयाग इलाहाबाद के अपने अंतिम मुकाम तक पहुँचनें के लिए भी संघर्ष करती है।

राजधानी दिल्ली भी इसी नदी के पानी से प्यास बुझाती आ रही है। लेकिन अफसोस,राजधानी मे शायद हीं कोई जगह हो जहाँ यमुना निर्मल हो। वजीराबाद बैराज एक ऐसी हीं जगह है जहाँ एक तरफ साफ निर्मल यमुना दिल्ली मे प्रवेश करती है तो दूसरी तरफ पूरे दिल्ली का कचड़ा उठाते हुए काली और मैली यमुना इसमें जुड़ जाती है।

साफ पानी  दिल्लीवासियों के प्यास बुझाने के लिए कारखाने मे जाती है जहाँ उसे पूर्णतः साफ कर घर घर मे पहुँचाया जाता है। वजीराबाद बैराज से आगे जाते हीं शुरू होता है इसके बदहाली का सफर…। इसके बाद जलपुरूष राजेंद्र सिंह इसे यमुना नदी नहीं,यमुना नाले के नाम से पुकारते हैं। बीबीसी से बातचीत मे वे कहतें हैं कि दिल्ली के 22 किलोमीटर के सफर मे 18 नालें से इस नदी से जुड़तें हैं जिसके बाद यह नदी मृत प्रायः हो जाती है।

राजधानी के असंख्य फैक्ट्रियों का मलबा इसे झेलना पड़ता है। आधुनिक बनने की भागदौड़ मे लोग अपने घर का कचरा इसमें हीं प्रवाहित कर देते हैं। मूर्ति विसर्जन से लेकर प्लास्टिक के थैले और सामग्रियों को फेंकते हुए तनिक भी नही सोंचते कि यहीं का पानी शुद्धिकरण के बाद उनके घरों तक पहुँचता है।

हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी

यूँ तो जागरूकता फैलाने के लिए सरकार  कई कार्यक्रम चलाती है लेकिन आमलोगों के सहयोग न मिलने के कारण स्थिति बद्तर बनी हुई है। दिवंगत पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने एकबार कहा था कि ‘कोई भी नदी साल मे एक बार फ्लड के साथ साफ हो जाती है लेकिन अगर आप फिर से गंदा करते हैं तो यह चिंता की बात है’।

कल कारखानों के कचरों से बचने के लिए सौर उर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाना चाहिए। घरों और कारखानों से निकलनेवाले मल का पूर्ण उपचार के बाद यमुना मे छोड़ना एक अच्छा समाधान साबित हो सकती है। अपनी जिम्मेदारी समझते हुए आमलोगों को भी नदी मे अनावश्यक स्नान करने कपड़े धोने या पशुओं को नहाने से बचना चाहिए।

कहते हैं कि जल हीं जीवन हैं, लेकिन अफसोस हम उस जीवन को हीं चौपट कर रहे हैं। बार बार सरकार पर आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा,आमलोगों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी।

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Ankush Kumar Ashu
Alrounder, A pure Indian, Young Journalist, Sports lover, Sports and political commentator
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