विचार

वंदे मातरम पर इतना घमासान क्यों ?

विगत कई वर्षों से हमारे देश मे वन्दे मातरम बोलने और ना बोलने को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है । इस मुद्दे पर कभी संसद मे तो कभी सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया जाता है मुझे ये समझ नहीं आता कि एक तरफ तो हम गर्व से कहते है कि हम भारतीय हैं , चाहे हम किसी भी धर्म या समुदाय से ताल्लुक रखते हों इसके बावजुद हम वन्दे मातरम कहने मे संकोच करते है हमारे विचार से तो ऐसा नहीं होना चाहिए ।

खैर , सबकि सोंच एक दूसरे से मैच नही खा सकती वैसे भी हमारे देश को विविधताओं का देश कहा जाता है । मेरे मन मे एक सवाल हमेशा कौंधता रहता है कि क्या हमारे देश का भविष्य वंदे मातरम कहने या ना कहने से तय होता है अगर नही तो इस मुद्दे को बार बार उठा कर देश के गति मे अवरोध भी नही पैदा करना चाहिए । इस मुद्दे को हमेशा कोई ना कोई संगठन या राजनीतिक दल ही उठाता रहा है ताज्जुब तो तब होती है जब हमारे देश के प्रहरी ऐसा करते हैं अर्थात लोकतंत्र द्वारा चुने गये देश के प्रहरी के सर पर इस को सवांरने का जिम्मेदारी है और वो इस मुद्दे को अपने राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए हमेशा हवा देते हैं तो मेरे ख्याल से ये हमारा दूर्भाग्य है कि हम अपने देश का भविष्य ऐसे लोगों के हांथों में सौंप देते हैं जो हमेशा अपनी लाभ चरितार्थ करते हैं और हम कहते है हमने देश को एक बेहतरीन नेता दिया है ।
आम तौर पर मुस्लिम समुदाय द्वारा ही वंदे मातरम कहने पर आपत्ति प्रकट किया जाता है भारत के सबसे बड़े इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम , देवबंद के अनुसार वंदे मातरम गान मुस्लमानों को नही करना चाहिए वो भी महज इस लिए कि उनका मानना है कि वंदे मातरम में वंदना का मतलब ईबादत होता है और वो अपना नाबूद सिर्फ अल्लाह को मानते हैं वो सबका एहतराम कर सकते है लेकिन अल्लाह के सिवाय किसी की इबादत नही कर सकते और वंदे मातरन में सिधे वंदना होती है, या युं कह सकते हैं कि वंदे मातरम न कहना उनकी एक मजबूरी है क्योंकि वो वंदे मातरम अर्थात वंदना नही करना चाहते ।
हालहिं में उत्तर प्रदेश मे वंदे मातरम को लेकर विवाद हुआ था कि अगर हिंदुस्तान में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा…. तो क्या वंदे मातरम कहने वाले ही भारतीय है और वो जो नही कहना चाहते तो उनका क्या , क्योंकि देश प्रेम बोल कर ही तो सिद्ध नही किया जा सकता । अगर देश के प्रहरियों को ऐसा लगता है तो मेरे मन में एक विचार है कि क्यों ना संसद मे इस मुद्दे को एक विधेयक पारित कर इसे सभी सरकारी गैर सरकारी संस्थानों , स्कूलों मे प्रार्थना के रुप मे अनिवार्य कर दिया जाए ताकि यह मुद्दा हमेशा के लिए समाप्त हो जाए ।

 

–  राहुल  तिवारी

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://thenationfirst.in

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