इतिहास के पन्नों से

हमारे धर्मशास्त्र के कुछ छंदों के साथ यह साहित्यकार कर चुका है खिलवाड़

बात अगर भारतीय संस्कृति और उसके धरोहरों की करें तो शायद कोई भी ऐसा देश नही है जो हमारे देश की संस्कृति और धार्मिक गुणवत्ता को अपने देश के नागरिकों में समाहित करना न चाहता हो लेकिन जब कोई विदेशी व्यक्ति हमारे धरोहर और संस्कृति से खिलवाड़ करे तो शायद हम भारतीयों को ये  बिल्कुल भी  बर्दास्त नही होगा।

जिस धार्मिक ग्रंथ या साहित्यिक ग्रंथ को हम अपना संस्कार मानते है और उस पर घमंड करते है और कहते हैं कि हमारा धार्मिक ग्रंथ और साहित्यिक ग्रंथ सम्पूर्ण संसार के धार्मिक ग्रंथों और साहित्यिक ग्रंथो में अद्वितीय है ।  एक ऐसा ही धर्मशास्त्र है मनुस्मृति ।

मनुस्मृति वह धर्मशास्त्र है जिसकी मान्यता पूरे विश्व मे है । इसके प्रमाणों के आधार पर न केवल भारत में अपितु विदेश में भी निर्णय लिए जाते हैं अतः धर्मशास्त्र के रूप में मनुस्मृति को विश्व की सबसे बहुमूल्य निधि के रुप मे स्विकार किया गया है जिसका कारण है कि भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता और प्रचलन ‘मनुस्मृति’ का ही है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य,अनेक प्रकार के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मनुष्य के जीवन में घटित होने सम्भव है।

इस अद्वितीय धर्मशास्त्र के कुछ श्लोकों और छंदों के साथ एक विदेशी साहित्यकार विलियम जोन्स ने कही न कही खिलवाड़ करने की कोशिश की है । मनुस्मृति की वास्तविक छन्दों और श्लोकों  को थोड़ा वास्तिवकता से दूर करने की कोशिस की गई ।

मनुस्मृति का एक श्लोक –

नाकृत्वा प्राणिनां हिंसा  मांसमुत्पद्दते क्वाचित् ।

न च प्रणिवध: स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयत् ।।

इस श्लोक का अर्थ है कि जीवों की हत्या के बिना कहीं भी मांस की प्राप्ति नही किया जा सकता और जीवों को मारना स्वर्गका देने वाला भी नही होता इस लिए मांस को त्याग देना चाहिए।

इस श्लोक के पहले छंद को वास्तविक से कोसों दूर दिखने की कोशिश की गई है। वहीं अगर एक और दूसरे श्लोक की बात करें तो उसमे भी उसे दुसरा अर्थ देने कि कोशिश की गई है

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रय विक्रयी ।

संस्कर्ता चोपहर्ता च खाद के श्रेतिघाटकः ।।

जिसका अर्थ है अनुमति देनेवाला , काटनेवाले, हत्या करनेवाला, खरीदने वाला, बेंचनेवाला,खाने और पकाने वाला व्यक्ति घातक होता है।

इस श्लोक के वास्तविकता को भी बदलने और इसके वास्तिवक रूप को इसके वास्तिवकता से हट कर दिखने का प्रयास किया गया है। विद्वानों की मानें तो इसके श्लोक को पूर्णतः बदल पाना विलियम जोन्स के वस में नही था परंतु मनु स्मृति के श्लोकों में थोड़ा बहुत बदलाव कर उसे उसकी वास्तिवकता से दूर करने का प्रयास जरूर किया गया है

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://thenationfirst.in

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