राजनीति

गुजरात-हिमाचल में ‘भगवा’ फतह, काँग्रेस के हाथ से छिना हिमाचल

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साख का सवाल लेकर खड़ा गुजरात चुनाव अपनें रिजल्ट की भगवा झंडी दिखा रहा है। मतलब साफ है,पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह नें ‘गुजरात का बेटा’ का जो भावनात्मक दाँव खेला,उसनें राजनीति सीख रहे राहुल गाँधी को मुँह के बल गिरा दिया। इस चुनावी दंगल का यह दाँव ठीक वैसा हीं है,जैसे बिहार में दो साल पहले नीतिश बाबू नें खेला था, बिहारी डीएनए वाला।

पाटीदार और दलित समुदाय के अगुआ हार्दिक पटेल,अल्पेश ठाकोर,जिग्नेश मेवानी के काँग्रेस के साथ जुड़नें को गुजरात में बीजेपी के अध्याय का समापन माना जा रहा था। लेकिन इन लोगों में वह आकर्षित करनें की शक्ति नहीं दिखी,जो वोट दिला सके। हार्दिक पटेल सहित कांग्रेस एवं विपक्ष के नेताओं का यह कहना कि ईवीएम से छेड़छाड़ कर बीजेपी को जीत मिली है, दिखाता है कि अब मर्यादा का कोई महत्व नहीं रह गया है।

काँग्रेस में जब सिर्फ इस बात का जश्न मनाया जा रहा हो कि उसनें बीजेपी को कड़ी टक्कर दी, तो जीतनें की सोंचना बेमानी है। हालात ऐसी है कि, जीतनें चले थे गुजरात,लेकिन गुजरात तो मिला नहीं,उल्टे हिमाचल प्रदेश भी गँवा दिया। सौराष्ट्र और कच्छ को छोड़कर पूरे राज्य में पाटीदारों नें बीजेपी को जमकर वोट किया। आदिवासी क्षेत्रों में,जहाँ काँग्रेस का गढ़ हुआ करता था,बीजेपी नें बड़ी बढ़त ले ली। राहुल गाँधी नें जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ बताकर जीतना हल्ला किया,जनता नें उसे उतनी हीं आसानी से नकार दिया।

व्यापारियों का शहर,सूरत में भाजपा के करारी हार की भविष्यवाणी की गई थी लेकिन यहाँ के ग्यारह में से दस सीट बीजेपी के खाते में चली गई। शहरी वोट पर तो भाजपा नें पकड़ बनाई हीं,साथ हीं ग्रामीण इलाकों में भी अपना परचम लहराया। इस राज्य में 25% वोटर ऐसे हैं जो शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं। जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है,शेयर बाजार बहुत अच्छे से चल रहा है। यही कारण है कि उन वोटरों नें भाजपा पर भरोसा बनाए रखनें में हीं अपनी भलाई समझी।

अगर कोई सोंच रहा है कि काँग्रेस नें भाजपा को कड़ी टक्कर दी है,उसको यह हकीकत जानना जरूरी है कि काँग्रेस को 79 सीटें इसलिए नसीब हुई क्योंकि बीजेपी के अलावा जनता के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था। 22 साल के सत्ता विरोधी फैक्टर को भुनानें में नाकामी का घाव 79 सीट से नहीं भरनें वाला। गुजरात और हिमाचल चुनाव नें दोनों पार्टियों के बड़े बड़े सूरमाओं को भी आईना दिखाया है। गुजरात में, काँग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन मोढ़वाढ़िया, राष्ट्रीय प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहित चुनाव हार गए वहीं हिमाचल में कई मंत्रियों की हार हुई। हालांकि बीजेपी के लिए भी अच्छी खबर नहीं रही।

पार्टी के सीएम कैंडिडेट प्रेम कुमार धूमल सुजानपुर से जबकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती ऊना से चुनाव हार गए। धूमल के हारते हीं यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि हिमाचल का अगला सीएम कौन होगा?….उनके बेटे अनुराग ठाकुर और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा का नाम आगे आगे लिया जा रहा है। लेकिन इन परिणामों से यह तो एकबार फिर स्पष्ट हो गया कि कोई कितना बड़ा शख्सियत क्यों ना हो,जनता के हाथ में उसके सत्ता की चाभी है।

गुजरात में भाजपा के सीटों में पिछले बार के मुकाबले 18 सीटों की कमी आई है लेकिन लगातार 22 साल तक सत्ता में रहने के बाद सारे सत्ता विरोधी लहर को झूठलाकर फिर से जीतना भी आम बात नहीं है,वह भी तब जब पूरा विपक्ष एक सुर में राग अलाप रहा हो। भाजपा नें 22 साल के शासनकाल में जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की जबर्दस्त फौज तैयार की है,वहीं काँग्रेस एक अदद नेता की तलाश हीं करती रह गई। सच है कि दोनों राज्यों में भाजपा की जीत एक शख्स के बदौलत हीं संभव हो पाई है,वह है पीएम नरेंद्र मोदी। 36 रैलियाँ,एक के बाद एक…गला जवाब देनें लगा फिर भी रूकना तो उनके फितरत में हीं नहीं है,फिर वो कैसे रूकते.. हरेक मुद्दे को जबर्दस्त तरीके से भुनाया चाहे वह मणीशंकर अय्यर का ‘नीच’ वाला बयान हो या अय्यर के पाकिस्तान जानें का मैटर।

इस चुनाव में विकास का खूब मजाक बनाया गया लेकिन जनता के दरबार में तथाकथित विकास हीं आगे निकल गया। भाजपा की जीत में मोदी जी नें जितनी मेहनत की, काँग्रेस के कुछ नेताओं नें पार्टी को डुबानें में उससे ज्यादा मेहनत की। मणीशंकर अय्यर की मेहनत रंग लाई, 22 साल बाद सत्ता वापसी की एक लौ नजर आ रही थी,वह भी बुझ गयी। हिमाचल से काँग्रेस के जाते हीं अब यह सबसे पुरानी पार्टी सिर्फ चार राज्यों में सिमट कर रह गई है पंजाब,कर्नाटक,मिजोरम,मेघालय।

रस्सी जलती जा रही है,लेकिन ऐंठन कम होनें का नाम नहीं ले रहा। यह चुनाव पार्टी को एक और सबक दे गया कि अगर अब नहीं सुधरे,तो इतिहास के किताबों में हीं सिमट कर रह जाओगे। बीजेपी को भी एक बात जरूर समझ में आ रही होगी कि आईनें में अपना चेहरा देखकर डुगडुगी पीटनें से वोट नहीं मिलते। रही बात हार-# जीत के अंतर की,तो ‘जो जीता वही सिकंदर’……इंतजार इंतजार और इंतजार काँग्रेस के लिए..

नरेंद्र मोदी से पहले न्यू इंडिया का सपना देश के इस व्यक्ति ने देखा था

 

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Ankush M Thakur
Alrounder, A pure Indian, Young Journalist, Sports lover, Sports and political commentator
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