कविता | poem

जलता रहा मैं रात भर

जलता रहा मैं रात भर
धु धु कर जलता रहा मैं रात भर
तप रही थी तुम भी तो उस आग में
तुम ने लगाई थी एक चिंगारी
धीरे धीरे जला आशियाँ मेरा
तेरी आंखों के शराब में
डूब हुआ था मैं उस रात
धु धु कर जल रहा था
आसियां मेरा जिस रात
दिल पसिझता रहा उस आग में
और हम उलझे जा रहे थे
तुम्हारे अल्फाज़ो के जज्बात में
लगा यही तो हसीं ख्वाब है
और जल रहे थे हसीं अरमान मेरे
तुम भी ही तो थी उस हसीं ख्वाब में
धु धु कर जलता रहा मैं रात भर
तप रही थी तुम भी तो उस आग में

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Rahul Tiwari

युवा पत्रकार

http://thenationfirst.in

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