इतिहास के पन्नों से

अगर ऐसा नहीं होता तो क्या चौरीचौरा आंदोलन बदल सकता था आजादी का इतिहास

देश का एक ऐसा व्यक्ति जिसने हमेशा अहिंसा के मार्ग पर चलने का प्रयत्न किया वो इस लिए क्योकी उनका मानना था कि अगर भारत को आजादी दिलानी है तो उसके लिए एक मात्र रास्ता है अहिंसा । जिस पर अगर पूरा देश चले तो हमें आजादी ज़रूर मिलेगी । उस समय कुछ ऐसे भी नेता थे जिनका सोचना था कि आजादी शांत बैठने से नही मिलेगी देश से अंग्रेजों को बाहर निकलने के लिए हिंसक होना ही पड़ेगा लेकिन गांधी जी ये सोचते थे कि अपने बातों को रखने के लिए शांति से बड़ा कोई रास्ता नहीं ।

5 फरवरी 1922 को जब गांधी जी द्वारा गोरखपुर में चौरीचौरा कांड के खिलाफ एक शांति आंदोलन चलाया जा रहा था तो अचानक पुलिस ने भीड़ पर गोलियां चलाना शुरू कर दी जिससे भीड़ ने उग्र रूप धारण कर लिया । गांधी जी ने इस उग्र भीड़ को रोकने का काफी प्रयास किया लेकिन वे असफल रहे और इस भीड़ में शामिल किसानों ने 22 सिपाहियों को थाने में बंद कर आग लगा दी जिससे सारे सिपाही मारे गए । इस हिंसक भीड़ का नेतृत्व एक भूतपूर्व सैनिक किसान भगवानदास अहीर कर रहे थे । यह एक ऐसी घटना थी जिससे गांधी जी को इस आंदोलन को बीच मे ही रोकना पड़ा गांधी जी को यह लग रहा था कि जब यह आंदोलन पूर्ण रूप से हिंसक हो जाएगा तो उनका उद्देश्य विफल हो जायेगा इसी लिए उन्होंने 22 फरवरी 1922 को इस आंदोलन को वापस ले लिया और गांधी जी का यह निर्णय तब से लेकर आज तक विवाद का कारण बना हुआ है ।

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वहीं इस आंदोलन से जुड़े नेताओ का मानना था कि एक कि गलती का खामियाजा पूरा देश क्यों भुगते परंतु गांधी जी की सोच इससे कही ऊपर और अलग थी गांधी जी सोचते थे कि अगर इस आंदोलन को बंद नही किया जाता तो चौरीचौरा कांड से सरकार को आंदोलन के दमन का बहाना मिल जाता जिसका परिणाम होता कि आंदोलन खुद ही नष्ट हो जाती इस लिए उचित है कि  आंदोलन को हमे खुद ही बंद कर देना चाहिए ।

जब विरोधों का सामना करना पड़ा था

इस आंदोलन को बंद करने के बाद गांधी जी को काफी कुछ सुनना पड़ा । लाला लाजपत राय और मोती लाल नेहरू ने जेल से ही गांधी जी को एक खत लिखा था और उस खत में उन्होंने गांधी जी से सवाल किया कि  एक स्थान पर दंगा होने के कारण सजा पूरे देश को देना कहाँ तक उचित है । वही सुभाष चंद्र बोस ने अपनी पुस्तक द इंडियन स्ट्रगलर में लिखा है कि ऐसे समय पर जब जनता का उत्साह चरम पर था पीछे लौटने का आदेश देना किसी राष्ट्रीय संकट से कम नही था । साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि महात्मा गांधी किसी अभियान का आरंभ तो काफी शानदार ढंग से करते हैं और अपनी कुशलता से उस अभियान को काफी आगे ले जाते हैं लेकिन अभियान जब अपने चरम पर होता है तो उनकी हिम्मत टूट जाती है ।

लेकिन गांधी जी की हिम्मत अब भी उनके साथ थी और उसी हिम्मत के साथ वो देश को आजादी दिलाने के लिए अथक प्रयास करते रहे और इस आंदोलन को वापस लेने के बाद भी उन्होंने कई आंदोलन किये जो सफल भी हुआ । उनके लगन और परिश्रम का ही फल है कि आज सम्पूर्ण देश उन्हें राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित करते है ।

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Rahul Tiwari

युवा पत्रकार

http://thenationfirst.in

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