जरा हट के

बिहारी हूँ लेकिन भिखारी नही हूँ

“इ ऑटो 5 लाख का है,दिल्ली में ऑटो लेना बहुत मुश्किल काम है जी । हम 1989 में मैट्रिक पास हुए थे बिहार में समस्तीपुर से। जाति से बनिया हैं। लोग सोचते हैं की बनिया लोग बहुत तेज़ होते हैं व्यापार कर लेते हैं,पेट चला लेते हैं लेकिन सब के साथ ऐसा नही है।बाबूजी शादी कर दिए तो कमाने बाहर जाना पड़ा । 1991 में असम गएँ,वहां एक दूकान में हेल्पर का काम किए लेकिन ULFA के डर से 2 साल में भाग कर घर आ गएँ।घर आएं तो 2 जर्सी गाय खरीदें लेकिन नसीब देखिये एक मर गई और दूसरा बीमार हुई जिसके इलाज में 20 हज़ार रुपया लगा, 1 लाख लोन सरकारी लोन निकाल के गाय खरीदे थें। लेकिन बिहारी हैं,तो आत्महत्या तो नही ही करेंगे हमलोग के नसीब में संघर्ष और गरीबी लिखा हुआ है।

दिल्ली आ गएँ 1998 में। यहाँ क्या काम मिलता पढ़े-लिखे सिर्फ दिखाने के लिए थें। शुरू में कुछ समझ में नही आया।2 लड़की का जन्म भी हो गया था उनकी जिम्मेवारी और ऊपर से लोन भी बैंक का।घर की पैतृक सम्पति भी नाम मात्र का है।तो दिल्ली में आकर रिक्शा चलाने लगें।तुर्कमान गेट के आसपास रिक्शा चलाने लगें जहां मुस्लिम लोग ज्यादा हैं,बोलते की 3 हैं और पता चलता की 3-4 बच्चे भी रिक्शा पर चढ़ा दिए जाते।लेकिन क्या कीजिएगा दिल्ली है, संघर्ष तो करना पड़ेगा।

एकदिन इसी तरह 4 लोग रिक्शा पर चढ़ गएँ। तुर्कमान गेट के पास वाला ओवर ब्रिज पर रिक्शा चढ़ा रहे थें तो चढ़ ही नही रहा था और जो लोग रिक्शा पर बैठे हुए थें वो भी निचे नही उतरे। रिक्शा को ब्रेक मारके उतरना चाहें लेकिन उसी समय पीछे से एक टैक्सी वाला आकर ठोक दिया। आगे का चक्का उठ गया और चारो लोग को चोट आया।झूठ नही बोलूंगा मुझे उस दिन पीटा गया लेकिन क्या करते।शाम को घर(किराया का घर) पहुंचा तो कमरा बन्द करके खूब रोया। कसम खाया की अब रिक्शा नही चलाएँगे।

फिर अगले दिन एक पुराना ऑटो के लिए बात किया,घर का जमीन बेचा और ऑटो ख़रीदा जिसको जमा करके एक नया ऑटो खरीदा,वो भी लोन पर,दिल्ली में नया ऑटो पुराने को जमा करने पर ही मिलता है,इसी को 2007 से चला रहा हूँ।घर में 2 लड़की का ब्याह हो चूका है,एक बेटा भी है जिसको अंग्रेजी मिडियम में पढ़ा रहा हूँ।इसके अलावे साहित्य से बहुत लगाव है विवेकानंद से लेकर रामधारी सिंह दिनकर तक को पढ़ता हूँ ।

बेटा भी मेरा पढ़ने में बहुत तेज़ है।कर्म कर रहे हैं,शाम को गीता रोजाना पढ़ते हैं ऑटो खड़ा करके।मन को शांति मिलता है। आप अगर इधर रहते तो आपसे रोजाना मिलते और साहित्य पर बात करते।जयशंकर प्रसाद से लेकर प्रेमचन्द और फणीश्वरनाथ रेनू सब का किताब रखे हैं,दिल्ली में तो किताब आसानी से मिल जाता है,आप जानते ही हैं।आप सुने ही होंगे की “साहित्य संगीत कला विहीनः,साक्षात् पशु करके है” यानि जो साहित्य,संगीत कला से विहीन हो वो पशु है।चलिए ये आ गएँ आप GTB नगर,फिर कभी मिले तो बात करेंगे।”

एक बिहार के ऑटो चलाने वाले राम शाहा ने जैसा सुनाया…

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Rajan Bhardwaj
Traveller,Deep interest in social-political-economical aspect of indian society, use to keep eye on international relationship. Spiritual by heart and soul.
http://thenationfirst.in

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