जुर्म

कठुआ पर हंगामा सासाराम पर चुप्पी आखिर क्यों!

बलात्कार कहीं भी हो निंदनीय है और हरेक बलात्कारी को अधिक से अधिक सजा होनी चाहिए।आज सवाल उनसे है जो 8 साल की लङकी आसिफा पर मजहब की राजनीतिक रोटियां सेकने की कोशिश कर रहे हैं।क्या हम जानवर हैं या मनुष्यता अभी भी बाकि है! लङकियों के घटते लिंगानुपात ने हमारे सामाजिक सोच को पहले ही उजागर किया है।

सवाल मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवीयों पर भी है जो खबर को उन्मादी रूप देती है।अब देखिए कठुआ के अलावा सासाराम के 6 वर्ष की बच्ची के साथ भी बलात्कार हुआ और उसकी हत्या करके लाश खेत में फेंक दिया गया लेकिन ज्यादातर मीडिया के लोग खामोश हैं क्यूंकि यह मामला पिछङे भारत के ग्रामीण इलाके की घटना है और दोषी अल्पसंख्यक समाज से है।यानि की बलात्कार अगर अल्पसंख्यक का हो,तो सभी के रोंगटे खड़े ,बलात्कार अगर दिल्ली में हो तो सभी के रोंगटे खङे लेकिन बलात्कार और हत्या अगर झारखंड,असम या छत्तीसगढ़ या आंध्रप्रदेश में हो तो यहाँ की लाशों की कोई न्याय नही,कोई खोजखबर नहीं।

3 महिने पहले झारखंड के रामगढ़ में सामुहिक बलात्कार के बाद किरण कुमारी नामक विवाहिता की हत्या कर दी गई थी। मामला सिर्फ इतना था की शादी के बाद उसने धर्म-परिवर्तन करने से इंकार किया था।गुस्साकर उसके पति ने अपने पिता और दोस्तो के साथ मिलकर बलात्कार किया और फिर हत्या।कौन से बङे मीडिया हाउस ने इस खबर को छापा और तरजीह दिया ये बात भी पुछा जाना चाहिए।

क्या दिल्ली में कैंडल मार्च निकालने वाले लोग हमें बताएंगे की सासाराम के 6 वर्ष की नाबालिग के बलात्कार और हत्या का आपको पता है या नही जानते!किरण कुमारी का मामला इसीलिए महत्वपूर्ण नही था क्योंकि मामला धर्म-परिवर्तन से जुङा था या किरण कुमारी दलित थी या किरण कुमारी गाँव की रहने वाली थी!इसीलिए किसी ने उसे तरजीह नही दिया।

पिछले 2 महिने से असम में लगातार कई बलात्कार की घटनाएं हुई है। 23 मार्च को गुवाहाटी से 125 किमी दूर लुलुनगांव में 5वीं मे पढने वाली लङकी का बलात्कार के बाद जिंदा जला देने की खबर आई।आल असम स्टुडेंट्स युनियन ने रैली भी निकाली लेकिन मामला शायद दिल्ली के रईश पत्रकारों तक नही पहुंच पाया या रईश पत्रकारों ने खबर को सुंघकर छोङ दिया क्योंकि खबर में 2-4 बांग्लादेशी फंस रहे थें।

भारत माँ एकबात साफ है की तुम्हारे बेटे टीआरपी देखते हैं,अपना मोटिव सेट करते हैं,सरकार को घेरने लायक चीज देखते हैं,तब टारगेट हिट करते हैं।ऐसा इसीलिए लिख रहा क्योंकि ये उन्नाव का मुद्दा 1 वर्ष पुराना है और कठुआ का 3 महीने पुराना।सासाराम का मुद्दा शायद 3 दिन पुराना हो इसीलिए न लिख रहें हों या शायद गरीब इलाको के लोगों और लङकियों और बलात्कार का कोई मोल नही ही है।जाते-जाते आशा करता हुं की आसिफा के दोषियों को फांसी मिले और सासाराम के बच्ची को पहले थोङी जगह मिले ताकि उसे भी न्याय मिलने का रास्ता खुल सके बाकि बाद उन्नाव का मुद्दा तो सीबीआई के पास है ही।

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Rajan Bhardwaj
Traveller,Deep interest in social-political-economical aspect of indian society, use to keep eye on international relationship. Spiritual by heart and soul.
http://thenationfirst.in

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