इतिहास के पन्नों से

इनाम और उपाधियों के चक्कर में शायर मिर्जा गालिब अंग्रेजों के चाटूकार बन बैठे थे

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हमारे देश मे काफी तादाद में शायर और ग़ज़लकार हुए जिन्हें इस देश की जनता ने खूब प्यार दिया और उनके प्यार का ही नतीजा होता है कि वो आसमान की बुलन्दियों पर होते हैं और उस शायर के  शायरी और ग़ज़ल से आप भी अपनो को खुश करने का हर संभव प्रयास करते हैं अर्थात यूं कह ले कि हमारे और आपके जीवन मे ग़ज़लकार और शायर का खास स्थान होता है और जैसे ही ये पता चलता है कि आज इस जगह पर नामचीन शायर ,ग़ज़लकार आ रहे हैं तो हम अपने काम को छोड़ कर उन्हें सुनने चले जाते हैं.

लेकिन जैसे ही आपको पता चलता है कि ये ग़ज़ल और शायरी समारोह का आयोजन किसी खास व्यक्ति के महिमामंडन के लिए किया गया है या इस ग़ज़ल और शायरी समारोह का आयोजन वैसे लोगों के लिए किया जा रहा है या लिखा जा रहा है जिसकी इस समाज को ज़रूरत ही नहीं है या इस समाज के दुश्मन हैं तो शायद आप को बिल्कुल भी अच्छा नही लगेगा  ।

1857 के दशक में एक ऐसे ही उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब हुए जो अक्सर अपनी शायरी का इस्तेमाल अंग्रेज़ो को खुश करने के लिए किया करते थे और उनके खुशामद पसंद थे जिस कारण उन्हेंने उसे खुश करने के लिए कई रचनायें की । जब 1857 में अंग्रेजों द्वारा खुलेआम कत्ल किया जा रहा था तब भी मिर्जा गालिब ने अंग्रेजो का ही समर्थन किया । उनकी एक किताब है दासतम्बू जिसमें उन्होंने 1857 के संग्राम को स्वन्त्रता की नही बल्कि बगावत की लड़ाई कहा और बागियों की निंदा बुरे शब्दों में करते हुए अंग्रेजो का समर्थन किया । एक तरफ क्रांतिकारी इस लड़ाई को लड़ कर अपनी जान गवां रहे थे तो शायद दूसरी तरफ मिर्जा गालिब अंग्रेजों को खुश कर अपना नाम बनाने और इनाम,वजीफे,पेंशन एंम उपाधियों के लिए अंग्रेजों के पिछे भागते रहे.

कह सकते हैं कि मिर्जा गालिब को  इन क्रांतिकारीयों की नही बल्कि अपने रुतबा की चिंता थी जिसमे वो लगे रहे. ये जान कर दुख होता है कि मिर्जा गालिब इन क्रांतिकारीयों का साथ देने के बजाय इनाम,वजीफे,पेंशन एंम उपाधियों के लिए अंग्रेजों के पिछे भागते रहे आखिर क्यों मिर्जा गालिब अंग्रेजों के साथ दे रहे थे ? क्या उन्हें इस देश से ज़रा भी लगाव नही था जहां उन्होनें जन्म लिया था ।

कहा जाता है कि जब अंग्रेजों ने मिर्जा गालिब के भाई मिर्जा यूसुफ़ को गोली मारी तब भी मिर्जा गालिब अंग्रेजों के साथ ही खड़े थे और उन्होंने अपने भाई की  हत्या को भी इन्तेकाल बताया. उनके भाई दिमागी मरीज थे और इस वास्तविकता को ग़ालिब ने छुपा लिया । मुझे ये तो नही पता कि उन्होंने ऐसा क्यों किया लेकिन उनके इतिहास को टटोलने के बाद यही पता चलता है कि उनमें कही न कही देश प्रेम की कमीं थी और शायद वो ये भी भूल गए कि आज उन्हें याद करने और दिलों में बसाने वाली जनता भारतीय ही है ना कि कोई अंग्रेज ।

1857 की वो क्रांतिकारी जो दिन में अंग्रेजो से लड़ती और रात में उन्हीं के छावनियों में नाचती थी

 

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://thenationfirst.in

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