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नरेंद्र मोदी से पहले ‘न्यू इंडिया’ का सपना देश के इस व्यक्ति ने देखा था

विकासशील देशों में से भारत भी एक ऐसा देश है जो दिन ब  दिन विकास कर रहा है और इसी विकास की गति को और रफ्तार मिले इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई सपने देखें जिसमें मेकिंग न्यू इंडिया इंडिया भी एक खास स्थान रखता है और इस सपने को ज़मीन पर उतारने की कोशिश प्रधानमंत्री लगातार कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने ये सपना उस वक़्त देखा जब उनके पूरे कार्यकाल के 3 वर्ष निकल चुके है. इस सपने को साकार करने के लिए उनके पास महज 2 वर्ष ही शेष बचे हुए हैं  तो ऐसे में ये सपना चुनौती पूर्ण है क्योंकि 2019 में चुनाव होना है हालाकि प्रधानमंत्री को कहीं न कहीं ये विश्वास है कि देश की जनता उन्हें एक बार फिर चुनकर सत्ता मे लाएगी और वो इस सपने को पूरा कर सकेंगे इसीलिए इस सपने को पूरा करने की अवधि 2022 तक रखी गई है क्योंकि प्रधानमंत्री का मानना है कि 2022 तक न्यू इंडिया का सपना एक जनआंदोलन के रुप मे उभरेगा जो हर भारतीय का सपना होगा इस भारत को एक समृद्ध भारत बनाने का ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यू इंडिया के रूप में एक ऐसा सपना देखा है जो एक बिल्कुल नवीन और समृद्ध भारत की रूप रेखा को तैयार करता है। आजादी के 7 दशक बाद किसी प्रधानमंत्री ने इस तरह के सपने देखें हैं और इसे जमीन पर उतारने के लिए पूर्जोर कोशिश कर रहा है । नरेंद्र मोदी से पहले न्यू इंडिया के सपने को  श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देखा था ।

इस सपने को देखने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी पहले व्यक्ति थे. उनका मानना था कि इस न्यू इंडिया के सपने को साकार करने का काम देश के छात्रों से ही संभव हो सकता है और 1937 में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी पटना विश्वविद्यालय में भाषण दे रहे थे तो उसी भाषण के दौरान न्यू इंडिया की बात रखी और एक समृद्ध भारत की कल्पना की थी। उसके बाद दोबारा  1940 में आगरा विश्वविद्यालय में अपने भाषण के दौरान भी उन्होंने  न्यू इंडिया की बात को दोहराया था ।

उनका मानना था कि इस सपने को एक नेता नही बल्कि एक आम आदमी ही पूरा कर सकता और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके सपने को न सिर्फ जमीनी हकीकत देने के संकल्प को दोहराया है बल्कि इसे एक जनआंदोलन के रुप मे खड़ा किया है और उनके इस आंदोलन मे देश के हर आम आदमी की सहभागिता है ।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बाद प्रधानमंत्री मोदी को छोड़ दिया जाए तो  किसी नेता ने इसकी चर्चा तक नही की जो इस दश के लिए हितकारी है चाहे वो कांग्रस हो या और कोई पार्टी जो सत्ता मे रही हो आम आदमी की चिंता करने के बजाए सभी ने अपनी राजनीतिक रोटी सेकना पसंद किया और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना “एक नवीन भारत” को किसी ठंडे बस्ते मे परा रहने दिया अगर इस सपने को 70 सालों के बीच मे कोई भी पार्टी ने देखा होता तो शायद यह केवल एक सपना नही बल्कि एक आंदोलन होता जो अबतक पूरा हो गया होता और भारत विकासशील देशों के दौर में ना होकर विकसित देशों के सूची में शुमार होता ।

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Rahul Tiwari
युवा पत्रकार
http://thenationfirst.in

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