कविता | poem

तकदीर

लो टकरा हीं गई तकदीर तुम्हारी
मेरे तकदीर की लकीरों से
तन्हा बैठ कब तक इबादत करोगी
इन पत्थर के फकीरों से

इनके आशीर्वाद तो खुद हीं तन्हा हैं
जो बरसते केवल अमीरों के दिल पे
आ खुद से गुफ्तगू कर मिटा दें
अपने फासलों को
तुम समझती हो, मैं समझता हूँ
मिला ही क्या है इन पत्थर के फकीरों से,

इनके आशीर्वाद में अब वो ताकत नही
जो मिटा दे हमारे फासलों को
दर दर भटकते ये खुद ही
दीमक खा गई है इनके हौसलों को

एक जमाना हुआ करता था
जब मेरा विश्वास भी अडिग था
इन पत्थर के फकीरों पे
अब तो खुद ही डूबने लगी है नैया इनकी
प्रेम के जालसाजों से

आ खुद हीं ढूंढ ले एक दूसरे को खुद में
तुम मेरे आंसू पोछ दो
मैं तेरी सिसकियां रोक दूं
अब आस नहीं मुझे इन पत्थर के फकीरों से
लो टकरा ही गई तकदीर तुम्हारी
मेरे तकदीर की लकीरों से।

 

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Rahul Tiwari

युवा पत्रकार

http://thenationfirst.in

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