विचार

वक़्त आ गया है अब नौजवानों को साफ़-साफ़ कहना होगा, देश प्रेम की प्रबल धार में हर मन को बहना होगा

आजाद भारत के आजाद लेखक के कलम से:-

मित्रों, हमें आरामदेह ज़िंदगी की कुछ ऐसी आदत हो गई है कि हम अपनी ज़िंदगी के इतर देखना ही नहीं चाहते। हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिस समय हम अपने एयरकंडीशनर के तापमान को अपनी सुविधानुसार घटा-बढ़ा रहे हैं ठीक उसी समय हमारे देश की सीमा की रक्षा कर रहे जाबांज़ सैनिक ख़ून जमा देने वाली ठंड और चमड़े जला देने वाली गर्मी में हमारी सुरक्षा हेतु तैनात हैं। हम अपनी आरामदेह बिस्तरों में घुस कर जिस लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं थकते, वो लोकतंत्र हमारी सेना की बदौलत ही महफूज़ है। और इसी क्रम में हमारे देश के कितने ही सैनिकों ने अपनी जानें कुर्बान कर दीं।

इसलिए, आज मैं खुद से, आपसे, और हमारे समाज से चंद सवाल पूछना चाहता हूँ,इन सवालों का जवाब हमें मिलकर तराशना होगा। सवाल जटिल है लेकिन इसका हल भी हमारे ही पास है..

1) क्या हमारे देश के बहादुर जवान गोलियाँ खाकर मरने के लिए पैदा होते हैं?

2) क्या इन्हें हमारी तरह चैन से जीने का कोई हक़ नहीं है??

3) NDA/IMA जैसी कठिन से कठिन ट्रेनिंग में जो सफल होते हैं वही कमांडो कहलाते हैं। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन भी उन्ही कमांडो में से थे जिन्हें हम 26/11 की रात को खो दिए… क्या इनते पढ़े-लिखे होकर, आतंकवादियों से लड़ना ही इनका धर्म बन गया है??? “हम हिन्दू मुसलमान मिल के आतंक के खिलाफ क्यों नहीं खड़े हो रहे हैं” ???

4) जब प्राकृतिक आपदा जैसे की बाढ़, सुनामी, भूस्खलन या भूकंप से जन-जीवन बाधित हो जाता है तो आर्मी (NDRF की टीम) को लोगों की मदद के लिए भेजा जाता है। और फिर जीवन सामान्य होने पर कुछ लोग उन्ही जवानों को दुहाई देते नहीं थकते.. क्या यह उचित व्यवहार है???

5) जम्मू-कश्मीर की घाटी में अलगाववादी नेता हिंसा फैलाने के लिए हमारे जवानों पर झूठा आरोप लगाते है। फिर स्थिति ऐसी होती है की देश के कुछ बुद्धिजीवी वर्ग बिना सच्चाई का पता किये, बिना किसी साबुत के सोशल मीडिया पर तर्क-हीन टिप्पणी करना शुरू कर देते हैं। उन बेवकूफों को ज़रा सी भी शर्म नहीं आती की वे ऐसा ‘गैर जिम्मेदार’ पोस्ट लिखकर देश में और अशांति फैलाने में मदद कर रहे हैं। आखिर ये कब रुकेगा???

6) हम अगर अपने ही जवानों पर उँगलियाँ उठाएंगे तो क्या इससे उनका मनोबल नहीं गिरेगा ???

एक लेखक होने के नाते देशहित के लिए मेरा मानना है कि अगर ‘हाफिश सईद जैसा आतंकवादी’ धर्म को आधार बनाकर ‘कुछ’ नौजवानों का इस कदर ब्रेन वॉश कर देता है की वो आतंक मचाना शुरू कर देते है, तो क्यों न हम सब “देशभक्ति” के नाम पर देश के नौजवानों में ऐसा जोश भर दें की वो उन आतंकवादियों के दांत खट्टे कर दें!

यदि हम में से हर एक के दिल में देश भक्ति कूट-कूट के भर जाए और हम अपने आस-पास के लोगों(नौजवानों) के मन में भी देशभक्ति की भावना जगा दें तो मेरा यक़ीन मानिये.. इस देश में आतंक पनप ही नहीं पायेगा और न ही हमें कभी आतंकवाद से डर होगा।

यदि “हम सब” यह संकल्प लें की इस 71 वीं आज़ादी में हम देशहित में देश के उन भटक रहे यंगस्टर्स को, आज़ाद/बेबाक/बिंदास नौजवानों को आज़ादी का सही मतलब समझाए तो यक़ीनन कुछ न कुछ फर्क तो जरूर पड़ेगा।

कुछ दिनों पहले न्यूज़ पे खबर आयी की “अलाहाबाद” के एक प्राइवेट स्कूल में 15 अगस्त को राष्ट्रगान गाने की इजाजत नहीं दी गयी है। ज़रा सोचिये की जब बचपन में ही बच्चों में ऐसा ज़हर भर दिया जायेगा तो वह बड़े होकर कैसे राष्ट्र का निर्माण करेंगे???

अगर हम इस ज़हर को बढ़ने से नहीं रोकेंगे तो हो सकता है की आने वाले दिनों में हमें अपने घरों में छिप कर राष्ट्रगान गाना परे। उम्मीद है ऐसी नौबत ना आये।

हमारा राष्ट्रगान “जन गण मन” हमारे आन-बाण-शान का प्रतिक है। हमारे देश की आत्मा है। अतः इसे पूरे जोश और सम्मान के साथ गाएं ताकि सुनने वाले हर एक हिंदुस्तानी के दिल में देश प्रेम की भावना जाग जाये।

एक लेखक के रूप में मेरा सिर्फ एक ही मकसद है की 15 अगस्त, 26 जनवरी को अचानक हमारे अंदर देश भक्ति की जो भावना उमड़ पड़ती है, सहिदों को याद करके जिस भावुकता में हम लीन हो जाते हैं… यदि उन्हें हम हर रोज़ याद करें और अपने देश की तरक्की के लिए अच्छे कर्म करें तो उनकी आत्मा को भी लगेगा की उनकी कुर्बानी बेकार नहीं गयी है।

जय हिन्द
जय भारत
वन्दे मातरम्

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Ramtanu Mukherjee
जिन्दगी हमारा हर पल इम्तेहान लेती है, उससे कभी घबराना मत। अगर मंज़िल सही हो तो हौसले भी बुलंद होने चाहिए। जिंदगी में आगे बढ़ो, पीछे मुड़कर देखने वाला पीछे ही रह जाता है।
http://thenationfirst.com

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