इतिहास के पन्नों से

अंग्रेजो पर विश्वास करने वाले इन कांग्रेसी नेताओं को जब डफरिन ने दिया था जोर का झटका

भारत की राजनीति और उसके इतिहास में कई नेताओं ने अपनी अलग अलग पहचान बनाई है जिसमे कइयों की पहचान काफी अच्छे और लोकप्रिय नेता के रूप में किया जाता है तो कुछ ऐसे नेता हुए जिन्हे जनता याद तो दूर की बात है सपने में भी नही देखना चाहती लेकिन मजे की बात तो ये है कि वो भी राजनीति में किसी न किसी कारण से बने रहते हैं और अपनी स्वार्थ बस जनता के बीच मे भी जाते रहते हैं ।

जब कांग्रेस अस्तित्व में आई थी उस समय यानी 1885 से लेकर 1905 तक ऐसे नेता थे जिन्हें लगता था कि अगर हम अंग्रेजों के अनुसार चलें तो हमें थोड़ी आजादी तो मिल ही सकती है और उन्होंने पूर्ण स्वराज न मांग कर कुछ रियायतें मांगी थी लेकिन वो शायद इस बात से बेखबर थे कि अंग्रेज केवल धनलोभी हैं या फिर यूं कह लें कि वो इस बात को मनना ही नही चाहते थे कि अंग्रेज उनके और देश के लिए अहितकारी भी साबित हो सकते हैं। ऐसे नेता को हमारे शब्द में पिछलग्गूआ कहते हैं (जो खुद कुछ नही सोंच सकते हैं) जो थे तो भारतीय लेकिन अंग्रेजी नीति में विश्वास करते थे । फिरोजशाह मेहता, आर सी दत्त, आनंद चार्लु, एस एन बनर्जी, दिनशा वाच, व्योमेश चंद्र बनर्जी, बदरुद्दीन तैय्यब जैसे नेताओं को लगता था की याचना करने से अंग्रेज उन्हें आजाद कर देंगे जो असंभव सा था ये नेता जनकल्याण तो करना चाहते थे लेकिन किसी भी आंदोलन को जनसामान्य की आंदोलन नही बनाना चाहते थे ।

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खैर एक ऐसा वक़्त आया जब ऐसे पिछलग्गूआ नेताओं की भी आंखे खुल गई जब 1888 में लार्ड डफरिन ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस सूक्ष्मदर्शी अल्पसंख्यक प्रतिनिधि संस्था है और उसके बाद 1890 में सरकारी कर्मचारियों को कांग्रेस में शामिल होने से रोक दिया गया और कांग्रेस के प्रति सरकार ने फुट डालो राज करो कि नीति अपनाते हुए मुसलमानों को कांग्रेस से अलग रखने का प्रयास करने लगा और कांग्रेस के राजभक्त सैयद अहमद खां से विरोधी प्रचार करवाने लगा और डफरिन के सुझावों पर सैयद अहमद खां ने 1888 में यूनाइटेड पेट्रियाट की स्थपना की जिसका उद्देश्य था कांग्रेस का विरोध करना ताकि मुसलमान कांग्रेस में शामिल ना हो सकें और पुनः सैयद अहमद खां ने 1893 में मोहम्डन ऐंग्लो ओरिएंटल डिफेंस एशोसिएशन अपर इंडिया की स्थपना की ।

और फिर कर्जन ने भी कांग्रेस की मौत की कामना की अतः इन नेताओं का भ्रम टूट गया और सरकार की आलोचना करना सुरु कर दिया ।

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Rahul Tiwari

युवा पत्रकार

http://thenationfirst.in

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