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बिहार में खेलों की बदहाली, कब लौटेगी मैदानों पर रौनक ?

भारत का उत्तर पूर्वी सीमावर्ती राज्य बिहार गौरवशाली इतिहास के असंख्य पन्नें को सहेजे हुए है|चाहे बात यहाँ के इतिहास की हो या वर्तमान राजनीति की, कोई भी ऐसी जगह नहीं जो बिहार की अनदेखी कर दे।

न्यूज चैनलों या अखबारों के समाचार का एक बड़ा हिस्सा बिहार को ध्यान में रखकर बनाया जाता है लेकिन इन सबके बीच बिहार में खेलों का बुरा हाल किसी से  छुपा नहीं  है|कई सरकारें आयीं,कई चली गयीं..लेकिन राज्य में खेल की हालत बस राम भरोसे हीं है ।

करीब तीन दशकों से खेल पटरी पर आनें के बजाय और धँसता चला जा रहा है|राज्य में खेलों को सबसे ज्यादा किसी नें तबाह किया है तो वो है यहाँ की राजनीति। नेता तो नेता ठहरे, लेकिन जब कोई खेल से जुड़ा इंसान भी मुँह फेर ले,तो दया भी आती है और रोना भी।

1983 विश्वकप विजेता टीम के खिलाड़ी कीर्ति आजाद दरभंगा से लगातार तीसरी बार सांसद हैं,लेकिन शायद हीं उन्होनें खेल और राज्य के खिलाड़ियों के लिए कुछ किया है| 2015 में जब राज्य में क्रिकेटर से नेता बनें तेजस्वी यादव डिप्टी सीएम बनाए गयें तो एक उम्मीद की किरण दिखाई दी कि शायद अब खेलों की हालत सुधरेगी लेकिन तेजस्वी नें जिस तरह अपने आप को एक मंझे हुए राजनेता के रूप में ढ़ाला, लगा हीं नहीं कि वे कभी क्रिकेटर भी थे।

ऐसी हालत तब है जब उन्हीं के पार्टी के लीडर कई खेलों के एसोसिएशन की कुर्सी पर ठाठ बाठ से बैठे हैं| यहाँ तक की उनके पिता राजद सुप्रीमों लालू यादव भी बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं।पिछले तीन दशक में लगभग 17 साल लालू यादव के पार्टी की सरकार रही है,ऐसे में जिम्मेदार कोई और नहीं, खुद वही हैं।लेकिन नीतिश कुमार के सीएम बननें के बाद खेलों की हालत थोड़ी सुधारी है, लेकिन यह मरहम-पट्टी से ज्यादा कुछ नही है।

सबसे दुखद बात है कि यहाँ खेलों के लिए अलग मंत्रालय तक नहीं है और जिस युवा मामलों के मंत्रालय में इसे रखा गया है,उसके मंत्री हीं कारगर नहीं है। खेल युवाओं को स्वस्थ रखता है,खेलों में पैसा है,करियर है,खेल में गौरव है, खिलाड़ी और राज्य दोनों का नाम रोशन होता है…लेकिन इन सबके बावजूद खेलों से वोट नहीं मिलता शायद यही कारण है कि न तो किसी पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में खेलों को जगह मिलती है और ना हीं सरकार बननें के बाद खेलों के लिए फंड जारी होता है स्टेडियम बदहाल है, हाँ वहाँ बकरी या गाय,भैंसे चरते हुए जरूरी मिल जायेंगी।

1996 विश्वकप क्रिकेट के दो मैचों को होस्ट करनें वाला इंटरनेशनल मोइनुलहक स्टेडियम पानी माँग रहा है।अब उसकी हालत देखनें के बाद यकीन करना मुश्किल है कि क्या यहाँ कभी इंटरनेशनल मैच भी हुआ था।

क्रिकेट,फुटबॉल या हॉकी के लिए बड़े ग्राउंड की जरूरत होती है, लेकिन राज्य के बड़े ग्राउंडों में गड्ढे बनें हुए हैं, जिसके कारण वह जानवर चारागाह बनकर रह गया है|मुजफ्फरपुर के खुदीराम बोस स्टेडियम में यदा कदा कोई स्टेट या नेशनल लेवल का फुटबॉल टूर्नामेंट हो जाता है,लेकिन सुविधाएँ तो शून्य के बराबर हैं।

खिलाड़ियों के पास मूलभूत साधन नहीं है।यही कारण है कि या तो अधिकतर युवा जो खेल में जाना चाहते हैं,बाहरी राज्यों का ओर निकल लेते हैं या फिर अपने सपनों को सीनें में सदा के लिए दफन।

न जानें कितनी बार राज्य में आवाज उठाई गई, क्रिकेट एसोसिएशन आॅफ बिहार के सचिव आदित्य वर्मा तो लगातार सुप्रीम कोर्ट में राज्य के क्रिकेट को पटरी पर लानें की लड़ाई लड़ रहे हैं, बहुत हद तक कामयाब भी हुए है। ध्यान रहे कि बिहार में दो क्रिकेट एसोसिएशन है, जिसकी आपसी लड़ाई कोर्ट में लड़ी जा रही है। आदित्य वर्मा उस दूसरे एसोसिएशन के सचिव हैं जिसे बागी भी कहा जाता है। अन्य खेलों की स्थिति सुधारनें के लिए भी ऐसे कई और आदित्य वर्मा की जरूरत है।…….’बिहार में खेलों की बदहाली’ सीरिज The Nation First पर जारी है …………………….

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Ankush Kumar Ashu
Alrounder, A pure Indian, Young Journalist, Sports lover, Sports and political commentator
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